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Showing posts from February, 2021

मत्स्य अवतार

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भगवान विष्णु के दशावतारों में से पहला अवतार मत्स्य अवतार, दूसरा कच्छप(कुर्म) अवतार, तीसरा वराह अवतार, चौथा नरसिंह अवतार, पांचवा वामन अवतार, छठवां परशुराम अवतार, सातवा श्री राम अवतार, आठवां श्रीकृष्ण अवतार, नवा महात्मा बुद्ध अवतार (मान्यता के अनुसार) हम यहाँ किसी दावे के साथ नही कह सकते हैं, क्यो की वेदों में ऐसा कोई उल्लेख नही है। दसवा अवतार कल्कि अवतार जो कलयुग का अंत करने के लिए कलयुग के अंत समय में जन्म लेंगे। मत्स्य अवतार भगवान विष्णु के  दशावतार में  प्रथम अवतार  मत्स्य अवतार है। पृथ्वी पर एक बहुत धर्मात्मा राजा सत्यव्रत रहता था एक दिन  प्रातः वह नदी में सूर्यदेव को अग्र दे रहे थे। तब उनके हाथो के जल में एक छोटी सी मछली(मत्स्य) आई और वह मछली बोली है राजन, आप मेरी रक्षा कीजिए अगर आप मुझे इस जल में वापस छोड़ देंगे तो मुझे यहां बडी मछली खा जाएँगी एक राजा का कर्तव्य होता है कि वह हर प्राणी की रक्षा करे अतः है राजन आप मेरी भी रक्षा कीजिए और आप मुझे अपने राज्य में छोटा सा स्थान देने की कृपा करे। PC @jegarupan_vathumalai/Instagram राजा बोले ठीक है मैं तुम्...

Receive Energized Rudraksh At Home For Free

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इस महाशिवरात्रि पर पहली बार सद्गुरु जी द्वारा रुद्राक्ष दीक्षा दी जा रही है। सद्गुरु धरती के हर इंसान को इन प्राण-प्रतिष्ठित रुद्राक्षों के रूप में, अध्यात्म की कम से कम एक बूंद भेंट कर रहे हैं। यह आदियोगी शिव की कृपा पाने का अनूठा अवसर है। आज ही रुद्राक्ष दीक्षा सामग्री  के लिए पंजीकरण करें, यह पूरी तरह निःशुल्क है। रुद्राक्ष दीक्षा पैकेज में निम्न प्रसाद शामिल हैं, जो पूरी तरह निःशुल्क है। 1. रुद्राक्ष रुद्र का अर्थ है शिव, अक्ष का अर्थ है अश्रु।  रुद्राक्ष शिव के आंसू हैं। मान्यता है कि एक बार, शिव लंबे समय तक ध्यान में बैठे रहे।  वे परम आनंद में निश्चल होकर कई वर्षों तक बैठे रहे।  ऐसा लगता था कि वे सांस भी नहीं ले रहे हैं, वे जीवित हैं इसका एक ही संकेत था - परमानंद के आँसू जो उसकी आँखों से टपक रहे थे।  ये अश्रु पृथ्वी पर गिर गए और रुद्राक्ष बन गया। अभय सूत्र - यह प्राण-प्रतिष्ठित धागा कलाई पर बांधा जाता है (महिलाओ की बाई, पुरुषों की दाईं)। इसे कम से कम 40 दिन पहनना चाहिए। यह डर दूर और महत्वाकांक्षाएं पूरी करता है। इसे गाँठ खोलकर या जलाकर उतारना चाहिए (न...

कौन है ऋषि-मुनि

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भारत में प्राचीन काल से ही ऋषि मुनियों का बहुत महत्त्व रहा है। ऋषि मुनि समाज के पथ प्रदर्शक माने जाते थे और वे अपने ज्ञान और साधना से हमेशा ही लोगों और समाज का कल्याण करते आये हैं। आज भी वनों में या किसी तीर्थ स्थल पर हमें कई साधु देखने को मिल जाते हैं। धर्म कर्म में हमेशा लीन रहने वाले इस समाज के लोगों को ऋषि, मुनि, साधु और संन्यासी आदि नामों से पुकारते हैं। ये हमेशा तपस्या, साधना, मनन के द्वारा अपने ज्ञान को परिमार्जित करते हैं। ये प्रायः भौतिक सुखों का त्याग करते हैं हालाँकि कुछ ऋषियों ने गृहस्थ जीवन भी बिताया है। भारत हमेशा से ही ऋषियों का देश रहा है। हमारे समाज में ऋषि परंपरा का विशेष महत्त्व रहा है। आज भी हमारे समाज और परिवार किसी न किसी ऋषि के वंशज माने जाते हैं। ऋषि वैदिक परंपरा से लिया गया शब्द है जिसे श्रुति ग्रंथों को दर्शन करने वाले लोगों के लिए प्रयोग किया गया है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है वैसे व्यक्ति जो अपने विशिष्ट और विलक्षण एकाग्रता के बल पर वैदिक परंपरा का अध्ययन किये और विलक्षण शब्दों के दर्शन किये और उनके गूढ़ अर्थों को जाना और प्राणी मात्र के कल्याण हेतु उस...