सनातन धर्म के अनुसार इस ब्रह्मांड में सर्वोच्च शक्ति त्रिदेवों में ही निहित है। त्रिदेवों में क्रमशः सर्वप्रथम भगवान ब्रह्मा, भगवान विष्णु, ओर भगवान शिव है। भगवान शिव ही सभी विरोधाभासी गुणों को सहज रूप से स्थापित कर के रखते हैं। भगवान शिव जिनके नाम का संस्कृत में अर्थ "शुभ" है, रक्षक और संहारक दोनों हैं। शक्ति की तरह शिव कई और अक्सर विरोधाभासी रूप लेते हैं, जैसे योगियों के दिव्य देवता के रूप में शिव तपस्वी, ब्रह्मचारी और आत्म-नियंत्रित हैं और हिमालय में कैलाश पर्वत की चोटी पर ध्यान में रहते हैं। भगवान शिव एक गृहस्थ के रूप में अपनी पत्नी पार्वती (शक्ति) है, जिसके साथ उनके दो बच्चे हैं, दोनों पुत्र: भगवान गणेश जो सभी बाधाओं को दूर करने वाले है और भगवान कार्तिकेय (स्कंद) युद्ध के देवता अर्थात देवसेना के आधिपत्य। भगवान शिव समय के परे हैं और उसी क्षण भगवान भोलेनाथ समय के साथ ही जुडे हुए है। भगवान शिव ब्रह्मांड की सभी चीजों के विनाशक के रूप में, साथ ही सृजन के साथ जुडे हुए है। विनाश और सृजन का आपस मे एक अटूट संबंध है क्यो की एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं हो सकता, यही अटूटता भग...
Posts
Showing posts from June, 2021
What is Dhyanalinga?
- Get link
- X
- Other Apps
ध्यान एक चमत्कार है क्योंकि यह जीवन को उसकी परम गहराई में जानने, जीवन को उसकी समग्रता में अनुभव करने की संभावना है। सद्गुरु बताते है कि आज आधुनिक विज्ञान आपको बिना किसी संदेह के यह बताता है कि पूरा अस्तित्व सिर्फ ऊर्जा है। जो इतने अलग-अलग तरीकों से खुद को प्रकट कर रहा है। केवल एक चीज यह है कि यह अभिव्यक्ति के विभिन्न स्तरों में है। जिसे आप सृष्टि कहते हैं, वही ऊर्जा है, स्थू ल से सूक्ष्मतम तक। सब कुछ एक ही ऊर्जा है, चट्टान भी ऊर्जा है, ईश्वर भी वही ऊर्जा है। यह स्थूल है ओर यही ऊर्जा सूक्ष्म है। यह भी पढ़े ➡️ Dhyan Mantra इस ऊर्जा को और अधिक सूक्ष्म बना सकते हैं, सूक्ष्मता के एक निश्चित स्तर से परे, आप इसे दिव्य कहते हैं। स्थूलता के एक निश्चित स्तर से नीचे, आप इसे पशु कहते हैं। इसके आगे आप इसे निर्जीव कहते हैं। यह सब एक ही ऊर्जा है। पूरी सृष्टि मेरे लिए सिर्फ एक ऊर्जा का केंद्र है, और अगर आप इसे देखें, तो यह आपके लिए समान है। जिसे आप ध्यानलिंग कहते हैं, वह ऊर्जा को सूक्ष्म और सूक्ष्म स्तरों पर ले जाने का ही परिणाम ह...
Shiva The First Yoga Guru
- Get link
- X
- Other Apps
योग परंपरा में भगवान शिव को पहला आदि योगी अर्थात योग का पहला गुरु माना जाता है सनातन संस्कृति के अनुसार भगवान शिव ने ही सर्वप्रथम योग का प्रतिपादन किया। व सप्त ऋषियों ने भगवान शिव से योग विद्या को ग्रहण करके मानव को यह ज्ञान प्रदान किया। योग परंपरा में शिव को भगवान नहीं माना जाता है योग परंपरा में शिव को पहला आदियोगी या आदि गुरु माना जाता है। जिन्होंने संपूर्ण मानव समाज का कल्याण किया है। योग परम्परा में भगवान शिव को आदि योगी और आदि गुरु माना जाता है। वह योगियों में सबसे अग्रणी और योग विज्ञान के पहले शिक्षक हैं। वह एक आदर्श तपस्वी और एक आदर्श गृहस्थ हैं, सभी में एक। उन्हें ब्रह्मांड की घटनाओं से अप्रभावित, कैलाशी पर्वत पर कमल मुद्रा में बैठे के रूप में चित्रित किया गया है। उनका शरीर पवित्र राख से लिपटा हुआ है। उनके बालों में अर्धचंद्र है जो रहस्यमय दृष्टि और ज्ञान का प्रतीक है। उनके गले में कुंडलित नाग हम सभी में मौजूद रहस्यमय कुंडलिनी ऊर्जा का प्रतीक है। गंगा नदी उनके सिर के मुकुट से निकलती है, जो शाश्वत शुद्धि का प्रतीक है, जिसे वह अपने भक्तों को प्...
Shiv Sanskrit Stotra
- Get link
- X
- Other Apps
Shiv Sanskrit Stotra | शिव सस्कृत स्तोत्र हिंदी अर्थ सहित मनो बुद्धि अहंकार चित्तानी नाहं नच श्रोत्र जिव्हे नच घ्राण नेत्रे नच व्योम भूमि न तेजो न वायु चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्शिवोऽहम् ||1|| मैं न तो मन हूँ, न बुद्धि, न अहंकार, न ही चित्त हूं मैं न तो कान हूं, न जीभ, न नासिका, न ही नेत्र हूं मैं न तो आकाश हूं, न धरती, न अग्नि, न ही वायु हूं मैं तो शुद्ध चेतना हूं, मैं तो अनादि ओर अनंत शिव हूं।। नच प्राण संज्ञो न वै पञ्चवायुः नवा सप्तधातुर्नवा पञ्चकोशः न वाक्पाणिपादौन च उपस्थ पायुः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्शिवोऽहम् || 2 || मैं न प्राण हूं, न ही पंच वायु हूं, मैं न सात धातु हूं, और न ही पांच कोश हूं, मैं न वाणी हूं, न हाथ हूं, न पैर, न ही उत्सर्जन की इन्द्रियां हूं, मैं तो शुद्ध चेतना हूं, मैं तो अनादि अनंत शिव हूं।। नमे द्वेषरागौ नमे लोभ मोहौ मदो नैव मे नैव मात्सर्यभावः न धर्मोनचार्थो न कामो न मोक्षः चिदानन्दरूपः शिवोऽहम्शिवोऽहम् || 3 || न मुझे किसी से घृणा है न लगाव है, न मुझे कोई लोभ है और न मोह, न मुझे अभिमान है और न किसी से न ईर्ष्या, मैं धर्म, धन, काम एवं मोक्ष से परे हूं। मैं तो शुद्ध ...
Some important Shlok
- Get link
- X
- Other Apps
सम्पूर्ण विश्व में सिर्फ सनातन धर्म ही है जिस का पालन कर कर मनुष्य अपना सर्वांगीण विकास कर सकता है। सनातन संस्कृति में प्रत्येक व्यक्ति व वस्तु का सम्मान हैं। सनातन धर्म में माता पिता की जो सुंदर व्याख्या है वो किसी अन्य धर्म में नही है। सनातन परंपरा में माता पिता को ईश्वर के बराबर माना गया है। माता पिता के महत्व बताते कुछ संस्कृत श्लोक:- Sanskrit Shlok For Father & Mother 1. पिता धर्म: पिता स्वर्ग: पिता हि परमं तपः। पितरि प्रीतिमापन्ने प्रीयन्ते सर्वदेवताः॥ पितरौ यस्य तृप्यन्ति सेवया च गुणेन च। तस्य भागीरथीस्नानमहन्यहनि वर्तते।। सर्वतीर्थमयी माता सर्वदेवमय: पिता। मातरं पितरं तस्मात् सर्वयत्नेन पूजयेत् ॥ मातरं पितरंश्चैव यस्तु कुर्यात् प्रदक्षिणम्। प्रदक्षिणीकृता तेन सप्तदीपा वसुन्धरा॥ हिंदी अर्थ जैसा कि पद्मपुराण में कहा गया है कि पिता धर्म है, पिता स्वर्ग है और पिता ही सबसे श्रेष्ठ तप है। पिता के प्रसन्न हो जाने पर सम्पूर्ण देवता स्वयं प्रसन्न हो जाते हैं। जिसकी सेवा और सदगुणों से पिता - माता संतुष्ट रहते हैं, उस पुत्र को प्रतिदिन गंगा - स्नान का पुण्य अपने आप ही मिलता है। म...
Most Powerful Dhyan Mantra
- Get link
- X
- Other Apps
श्लोको व मन्त्रो का सनातन धर्म में सबसे अत्यधिक महत्व है। प्रत्येक देवी देवताओं की पूजा या कोई भी धार्मिक अनुष्ठान बिना मंत्रो उच्चारण के सम्भव नहीं है। आखिर क्या होते हैं मन्त्र? मंत्र शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों के मेल से बना है। जैसे मन+तंत्र = मंत्र। अगर मंत्र शब्द को सरल भाषा मे समझे तो मंत्र शब्द मन ( अर्थात मन अथवा सोचना) ओर तंत्र का अर्थ है रक्षा या खुद को मोह माया से मुक्त करना से है। अर्थात मंत्र एक प्रकार का उपकरण है जो ध्यान साधको को एक उच्च सर्वोच्च शक्ति प्रदान करने ओर स्वंय की खोज करने का महत्वपूर्ण क्रिया है। प्रत्येक देवी देवताओं के अलग अलग ध्यान मन्त्र होते है। यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ चुनिंदा ध्यान मंत्र। नीचे दिए गए देवी देवताओं के 6 ध्यान मंत्र आपको संस्कृत श्लोक तथा उसके हिंदी और इंग्लिश अर्थ के साथ उपलब्ध है। प्रतिदिन ध्यान में पढ़े जाने वाले मन्त्र:- 1. भगवान श्री विष्णु का ध्यान मन्त्र संस्कृत :- उद्यत् कोटि दिवाकरा भमनिशं शङ्ख गदां पङ्कजं चक्रं बिभ्रत मिन्दिरा वसुमती संशोभिपार्श्वद्वयम् । कोटीराङ्गद हार कुण्डल धरं पीताम्बरं कौस्तुभै दीप्तं विश्वधरं स...
Maharana Pratap The Greatest King
- Get link
- X
- Other Apps
महाराणा प्रताप नाम ही स्वयं व्याख्यात्मक। वह दुनिया के अब तक के सबसे महान राजाओं में से एक है। महाराणा प्रताप का पूरा जीवन प्रेरणा और महान वीरता से भरा है। 1. महाराणा प्रताप दुनिया में सबसे लंबे समय तक शासन करने वाले राजपरिवार सिसोदिया वंश के सबसे प्रसिद्ध राजा हैं। इस वंश ने 15 अगस्त 1947 तक 1300 वर्षों तक मेवाड़ पर शासन किया। प्रारंभ में 734 ईसा पूर्व में कालभोज (बप्पा रावल) को मेवाड़ का अधिकार मिला। 2) उनका जन्मस्थान यानी कुंभलगढ़ किला उनके परदादा ने बनवाया था और ग्रेट वॉल ऑफ चाइना के बाद इसकी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी दीवार है। 3) मेवाड़ की राजधानी यानी चित्तौड़गढ़ भारत का सबसे बड़ा किला और राजस्थान का सबसे मजबूत किला है। 65000 (लगभग) सैनिकों की अपनी सेना के साथ अकबर को भी किले को जीतने के लिए चित्तौड़गढ़ के 8000 सैनिकों के साथ 6 महीने की लड़ाई करनी पड़ी थी। इस तथ्य का भी उल्लेख करने के लिए कि चित्तौड़गढ़ के पतन के बाद किले पर पूर्ण नियंत्रण पाने के लिए मुगल सैनिकों को लगभग 1 महीने का समय लगा। 4) महाराणा प्रताप ने अपनी पहली लड़ाई...
KarmYoga By Lord Shri Krishna
- Get link
- X
- Other Apps
श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्री कृष्ण ने कर्म योग के बारे में बताया है। क्या होता है कर्मयोग ओर क्यो भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का महत्व समझाया। श्रीमद्भागवत गीता में मनुष्य जीवन के सभी दुःखो का समाधान है। संसार मे श्रीमद्भागवत गीता सुखी जीवन और अस्तित्व की एकमात्र कुंजी है।। the_shivshakti/instagram श्रीमद्भागवत गीता के अनुसार क्या है कर्म योग? श्रीमद्भागवत गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है...... यस्तविंद्रियाणी मनसा नियमित्रभतेऽर्जुन । कर्मेन्द्रियैः कर्मयोगमस्क्तत स विशिष्यते ॥ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं जो अपनी इच्छा शक्ति से इन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों को वश में करता है और अनासक्त रहकर उन इन्द्रियों के द्वारा निःस्वार्थ कर्मयोग करता है, अर्जुन वह ही श्रेष्ठ है। क्या है धर्म, कर्म और मोक्ष? ( पूरा लेख पढ़ें) श्री भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्मयोग का सन्देश कितनी सरलता व सुन्दरता से दिया है। लेकिन आम भाषा में कर्मयोग क्या है? कर्म योग को समझने से पहले कर्म और योग को प...
lord Shiva's most powerful mantra part 1
- Get link
- X
- Other Apps
भगवान शिव बहुत ही शीघ्र प्रसन्न होने वाले ओर साधारण तरीके से भी की गई पूजा पर अपने भक्तों को अभयदान देने वाले भोलेनाथ है। भगवान शिव की की स्तुति के लिए प्रस्तुत है भगवान शिव के कुछ त्वरित फलदायी मन्त्र 1. न पुण्यं न पापं न सौख्यं न दुःखं न मन्त्रो न तीर्थं न वेदो न यज्ञः | अहं भोजनं नैव भोज्यं न भोक्ता चिदानन्द रूपः शिवोऽहं शिवोऽहम् ॥ Na punyam na papam, na sokhyam, na dukham, na mantro, na tirtham, na vedo, na yagyah | aham bhojanam, neva bhojyam, na bhokta chidanand rupah shivoham shivoham || हिंदी अर्थ : - न मैं पुण्य हूँ , न पाप , न सुख और न दुःख , न मन्त्र , न तीर्थ , न वेद और न यज्ञ , मैं न भोजन हूँ , न खाया जाने वाला हूँ और न खाने वाला हूँ , मैं चैतन्य रूप हूँ , आनंद हूँ , शिव हूँ , शिव हूँ ।। English translation : - I am not virtuous , neither sin , nor happiness nor sorrow , nor mantra , nor pilgrimage , nor , , Vedas nor yajna , I am neither food , nor will I eat , nor am , I , , I to eat , I am conscious form , am bliss , I am Shiva , I am Shiva. 2. करचरण कृतं वा...
क्या है धर्म, कर्म और मोक्ष
- Get link
- X
- Other Apps
धर्म, कर्म और मोक्ष सरल सारांश सनातन धर्म की एक उत्कृष्ट विशेषता " पुरुषार्थ " का सिद्धांत है, जो एक व्यक्ति के जीवन में चार पूरक कार्यों विधान बताता है। यह विधान है धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। 1. धर्म :- धर्म ईमानदारी, करुणा, सच्चाई और शरीर और मन की पवित्रता के नैतिक मूल्यों पर जीवन का सचेत आचरण चाहता है। यह नैतिक जीवन के प्रति एक व्यवहार है। धर्म में तपस्या, साधुता, क्रोध का अभाव और अहिंसा शामिल है। धर्म आधारित कार्य, कर्तव्य और जिम्मेदारियां एक धर्मी जीवन के प्रति प्रतिबद्धता हैं। 2. अर्थ:- अर्थ का अर्थ है आर्थिक स्वतंत्रता या स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए पर्याप्त धन अर्जित करने के लिए काम करना चाहिए। काम जीवन में सुख और आनंद की आवश्यकता पर भी जोर देता है। 3. मोक्ष:- मोक्ष या मुक्ति स्वतंत्रता का प्रतीक है, यह एक बहुप्रचारित सनातन पारंपरिक विचार है। संक्षेप में यह सर्वोच्च सत्ता ( भगवान ) की तलाश करने के लिए उत्साही पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है। मोक्ष में मोक्ष-शास्त्र के संकाय के तहत दो संबद्ध है लेकिन अलग-अलग कॉन्सेप्ट शामिल हैं। ...
विश्व पर्यावरण दिवस पश्चिमी देशों का एक मजाक
- Get link
- X
- Other Apps
वर्ष भर हम पर्यावरण का दोहन कर के हर साल 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस (World Environment Day) मनाते हैं। यह सिर्फ पर्यावरण के प्रति हम लोगो की एक खानापूर्ति को दर्शाता है। वर्ष भर हम ने प्रकृति के लिए क्या किया? आज मानव सभ्यता आधुनिक विकास और टेक्नोलॉजी के विकास के पीछे भाग रही। कल तक जो "पढ़े लिखे लोग" पेड़ पोधो को, हवा पानी या पर्यावरण कुछ नही समझते थे आज अचानक से पर्यावरण बचाओ का नारा लगाने लगे हैं। बड़ी बड़ी बाते करने लगे हैं। क्यो? क्यो की आज मानव जीवन की सांसो पर खतरा बढ़ने लगा है। आज दुनिया चिल्ला रही है ग्लोबल वार्मिंग से बचो, कभी सोचा है कि यह ग्लोबल वार्मिंग किस का नतीजा है? यह नतीजा पर्यावरण के दोहन का है। पानी, हवा, नभ, थल, समुद्र कसी भी जगह को हम ने नही छोड़ा हम ने अपने स्वार्थों के लिए पूरे ब्रह्मांड को प्रदूषित कर दिया है। भारत जैसे महान देश की संस्कृति में प्रकृति को सर्प्रथम पूजने का विधान है। लेकिन आज यहाँ भी लोगो को चकाचौंध ले बैठी। आज जीव जंतुओं व पेड़ पौधों की पूजा करना उन में पानी देना लोगो को ढोंग व अंधविश्वास लगता है। सनातन धर्म मे इसलिए प्रकृति के तत्वों...