राधा जी कौन हैं और क्यों वे श्री कृष्ण जी का हृदय कहलाती हैं?


राधा जी कौन हैं और क्यों वे श्री कृष्ण जी का हृदय कहलाती हैं?

यह एक गहरा और आध्यात्मिक विषय है।


श्रीजी ओर लालजू के बारे में बड़े बड़े संत, ऋषि मुनि भी नहीं लिख पाए फिर हम जैसे साधारण मनुष्यों के द्वारा तो बताना संभव ही नहीं है। फिर भी संतो के श्री मुख से जो सुना है उसका कुछ अंश यहां प्रस्तुत है।


प्रश्न 1: श्री राधा जी कौन हैं?


उत्तर: राधा जी भगवान श्री कृष्ण की सबसे प्रिय और दिव्य शक्ति हैं। वे केवल उनकी प्रेमिका नहीं, बल्कि भगवान की आनंदमयी ह्लादिनी शक्ति हैं, यानी वे वह शक्ति हैं जो कृष्ण के प्रेम का स्वरूप हैं। भक्तों की दृष्टि में राधा सर्वोच्च प्रेम और भक्ति की देवी हैं, जो भक्तों को श्री कृष्ण तक पहुंचाती हैं। श्रीजी के नाम के बिना "श्री कृष्ण" को कोई नहीं पा सकता है। 



प्रश्न 2: राधा को श्री कृष्ण का हृदय क्यों कहा जाता है?


उत्तर: श्री कृष्ण की तीन प्रमुख शक्तियां होती हैं – ज्ञानमयी, संकल्पमयी और ह्लादिनी (आनंद देने वाली) शक्ति। राधा ह्लादिनी शक्ति का रूप हैं। वे कृष्ण के हृदय में बसे प्रेम का साक्षात स्वरूप हैं। कृष्ण और राधा एक-दूसरे के पूरक हैं; राधा के बिना कृष्ण अधूरे हैं। वे इसलिए कृष्ण का हृदय कहलाती हैं क्योंकि उनके प्रेम के बिना कृष्ण की पूर्णता नहीं होती।



प्रश्न 3: राधा-कृष्ण का प्रेम कैसा था?

उत्तर: राधा और कृष्ण का प्रेम भौतिक नहीं, बल्कि आत्मीय, निःस्वार्थ और दिव्य था। इसमें समर्पण, त्याग, विश्वास और भक्ति का सामाल है। उनका प्रेम सात्विक प्रेम का प्रतीक है, जहां न कोई स्वार्थ होता है, न कोई उम्मीद। उनकी प्रेम लीला अधूरी प्रेम कथा नहीं, बल्कि प्रेम की उच्चतम मिसाल है।



प्रश्न 4: भक्ति में श्री राधाजी का स्थान क्या है?

उत्तर: भक्ति मार्ग में राधा को प्रेम का सर्वोच्च स्वरूप माना जाता है। भक्त सबसे पहले उनका नाम लेते हैं क्योंकि राधा के हृदय में ही कृष्ण का पूर्व-प्रिय प्रेम निवास करता है। राधाजी भक्तों का मार्गदर्शन करती हैं कि वे खुद प्रेम के इस अद्भुत स्वरूप को समझें और उससे जोड़ें।


प्रश्न 5: श्री राधा-कृष्ण से हमें क्या सीख मिलती है?

उत्तर: श्री राधा-कृष्ण का प्रेम हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम निःस्वार्थ, समर्पण और त्याग का होता है। प्रेम में कोई शर्त और सीमा नहीं होती, न विवाह, न मिलन जरूरी है। प्रेम का असली स्वरूप है आत्मा की एकता और परमात्मा के साथ भक्ति। उनके प्रेम से हमें भौतिक दुनिया की सीमाओं से ऊपर उठकर प्रेम और भक्ति की गहराई समझनी चाहिए। इस प्रकार, राधा जी श्री कृष्ण जी के प्रेम और आनंद के हृदय स्वरूप हैं, जिनके बिना कृष्ण अधूरे हैं। उनकी भक्ति और प्रेम की महत्ता हमारे जीवन और आध्यात्मिक मार्गदर्शन में अत्यंत महत्वपूर्ण है। यही कारण है कि भक्त उन्हें "श्री राधा", "राधा हृदय" के रूप में पूजते हैं, जो कृष्ण तक पहुंचने का सर्वोच्च माध्यम हैं। यह प्रेम न केवल एक आध्यात्मिक अनुभव है, बल्कि जीवन का दिव्य उपहार भी है। 


।। जय राधा माधव।। श्रीजी सदा सहा

यते ।। जय श्री कृष्ण।।

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