हनुमान जी की छलांग: समुद्र लाँघ लंका जलाई! रामायण लंका कांड की गुप्त लीला
लंका कांड की महिमा
रामायण का लंका कांड केवल युद्ध का वर्णन नहीं, बल्कि भक्ति, साहस, त्याग और धर्म की विजय की अद्भुत गाथा है। इस प्रसंग में भगवान श्रीराम के अनन्य भक्त हनुमान जी का तेज, पराक्रम और विनम्रता पूरे चरम पर दिखाई देती है।
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हनुमान जी का समुद्र लांघना
सीता माता की खोज जब किसी भी दिशा से सफल नहीं हुई, तब जामवंत जी ने हनुमान जी को उनका अपना बल याद दिलाया। स्मरण होते ही वे पर्वत समान विशाल रूप धारण कर “जय श्री राम” का नाद करते हुए एक ही छलांग में समुद्र पार करने निकल पड़े। रास्ते में पर्वत मैनाक, नाग कन्या सुरसा और समुद्र की लहरें भी उनकी परीक्षा लेती हैं, लेकिन हनुमान जी हर परीक्षा को सहजता, बुद्धि और विनम्रता से पार कर लेते हैं।
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लंका में प्रवेश और लंकिनी से भेंट
समुद्र पार कर हनुमान जी त्रिकूट पर्वत के शिखर पर पहुंचे और वहाँ से स्वर्णमयी लंका का अद्भुत वैभव देखा। रात का समय चुनकर उन्होंने सूक्ष्म रूप धारण किया और नगर के द्वार पर पहुँचे, जहाँ लंका की रक्षक राक्षसी ‘लंकिनी’ ने उनका मार्ग रोका। हनुमान जी ने उसे हल्का-सा घूँसा मारा तो वह भूमि पर गिर पड़ी और समझ गई कि ब्रह्मा जी की बताई हुई भविष्यवाणी अब सत्य हो चुकी है – वानर के हाथों हार का अर्थ राक्षस कुल के विनाश की शुरुआत है। वह हनुमान जी की वंदना कर उन्हें आगे जाने का आशीर्वाद देती है।
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अशोक वाटिका में सीता माता का दर्शन
सूक्ष्म रूप में हनुमान जी लंका के राजमहल और गलियों का निरीक्षण करते हुए अशोक वाटिका पहुँचे, जहाँ रावण ने सीता माता को कैद कर रखा था। एक वृक्ष की डाल पर बैठकर उन्होंने राम नाम लिखित अंगूठी सीता जी के सामने गिराई और मधुर वचनों में अपना परिचय रामदूत के रूप में दिया। सीता माता का दुख, विरह और तप देखकर हनुमान जी की आँखें नम हो गईं, पर उन्होंने उन्हें श्रीराम जी के शीघ्र आगमन का विश्वास दिलाया और श्रीराम का संदेश सुनाया। सीता जी ने अपने चूड़ामणि को श्रीराम के नाम संदेश के साथ हनुमान जी को सौंप दिया, ताकि राम यह पहचान लें कि वे वास्तव में उनके पास पहुँचे हैं।
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हनुमान जी का पराक्रम और लंका दहन
विदा लेने से पहले हनुमान जी ने सोचा कि लौटने से पहले रावण की शक्ति और लंका की व्यवस्था का भी अनुमान कर लिया जाए। वे विशाल रूप धारण कर अशोक वाटिका के वृक्षों, महलों और सैनिकों का नाश करने लगे। इस पर रावण का पुत्र मेघनाद (इंद्रजीत) आया और युद्ध में ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान जी जानते थे कि ब्रह्मास्त्र का अपमान नहीं करना चाहिए, अतः उन्होंने स्वयं को बंधन में जाना स्वीकार किया और बंदी बनाकर उन्हें रावण की सभा में ले जाया गया।
रावण ने हनुमान जी से प्रश्न किए, पर हनुमान जी ने निर्भीक होकर उसे धर्म का मार्ग दिखाया – सीता माता को लौटाने और श्रीराम की शरण में आने की सलाह दी। क्रोध में अंधा रावण उन्हें मार डालना चाहता था, लेकिन विभीषण ने दूत-वध को अधर्म बताया। तब निर्णय हुआ कि हनुमान की पूँछ में आग लगाकर नगर में घुमाया जाए।
हनुमान जी ने भीतर ही भीतर यह अवसर भी प्रभु सेवा का साधन मान लिया। जब राक्षस उनकी पूँछ पर कपड़ा और तेल बाँध रहे थे, वे धीरे-धीरे पूँछ को लंबी करते गए, जिससे पूरा नगर कपड़े और तेल में व्यस्त हो गया। जैसे ही पूँछ जलाई गई, हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धारण कर बंधन तोड़ दिए और अग्नि-मय पूँछ के साथ आकाश में उछल पड़े। वे एक-एक महल, भवन, शस्त्रागार और रावण की स्वर्ण लंका की गलियों पर कूदते हुए उन्हें आग के हवाले करते चले गए। देखते ही देखते सोने की लंका का घमंड भस्म हो गया।
अंत में उन्हें ध्यान आया कि कहीं इस अग्नि से सीता माता को कष्ट न पहुँचे, तो वे तुरंत अशोक वाटिका के पास गए और पाया कि अग्निदेव ने सीता माता की रक्षा की है। फिर समुद्र के जल में डुबकी लगाकर अपनी जलती पूँछ की ज्वाला शांत की और पुनः सीता माता को प्रणाम कर आश्वस्त किया कि अगली बार वे श्रीराम के साथ आएँगे।
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श्रीराम के पास वापसी और संदेश
लंका दहन के बाद हनुमान जी फिर से विशाल छलाँग लगाकर समुद्र पार करते हुए जामवंत, अंगद और वानर सेना के पास लौटे। सबने जय-जयकार की और वे सब मिलकर श्रीराम की शरण में पहुँचे। हनुमान जी ने नम्रता से श्रीराम के चरणों में गिरकर सारी कथा सुनाई – लंका का वैभव, रावण का अहंकार, सीता माता की पवित्रता और धैर्य, तथा लंका दहन तक का पूरा वृत्तांत।
सीता माता के संदेश और चूड़ामणि को पाकर श्रीराम की आँखें भर आईं, पर हृदय में युद्ध के लिए दृढ़ संकल्प और भी प्रबल हो गया। हनुमान जी का यह कार्य – समुद्र लाँघना, सीता माता का पता लगाना, रावण को चेतावनी देना और लंका दहन – रामायण के उस मोड़ को दर्शाता है जहाँ से अधर्म के अंत की घड़ी निश्चित हो जाती है।
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लंका कांड से मिलने वाले प्रेरक संदेश
- सच्ची भक्ति इंसान को असंभव कार्य करने की शक्ति देती है, जैसे हनुमान जी ने समुद्र पार किया।
- शक्ति के साथ विनम्रता और धर्म-सम्मत आचरण उतना ही आवश्यक है, इसलिए हनुमान जी ब्रह्मास्त्र का सम्मान करते हैं और दूत धर्म का पालन करते हैं।
- अहंकार चाहे स्वर्ण लंका जितना चमकदार हो, अंततः धर्म की अग्नि में भस्म हो जाता है।
- सीता माता का धैर्य, पवित्रता और सत्य पर दृढ़ विश्वास हर साधक के लिए आदर्श है।
।। जय श्री सीताराम 🙏🏻 ।। जय रामभक्त हनुमान 🙏🏻 ।।
